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ITI द्वारा आयोजित विश्वकर्मा पूजन किया गया.

विश्वकर्मा पूजा, जो हर साल 17 सितंबर को मनाई जाती है, का मुख्य कारण ब्रह्मांड के दिव्य वास्तुकार और इंजीनियर भगवान विश्वकर्मा का सम्मान करना है इस दिन इंजीनियरों, कारीगरों और मजदूरों द्वारा अपने कार्यक्षेत्र में सफलता, समृद्धि और सुरक्षा के लिए प्रार्थना की जाती है, क्योंकि उन्हें शिल्प कौशल और निर्माण का देवता माना जाता है । आज इस क्रम में गाज़ीपुर के जमानिया कोतवाली क्षेत्र के खास लोदीपुर स्थित बजरंग ग्रुप ऑफ ITI द्वारा आयोजित दिनांक 17.09.2025 को किया गया विश्वकर्मा पूजन  जिसमें उप प्रबंधक रिंकू राय व प्रधानाध्यापक राजेश राय सहित विद्यालय के अध्यापक व छात्र आदि मौजूद रहे। वही बताते चले कि यह हवन – पूजन की शुरूआत सुंदर कांड के साथ किया गया इसमें गायन करता रहे कमलेश राय, डी के राय, धनंजय और विद्यालय के अध्यापक रहे उसके बाद विश्व के रचयिता आदिकाल से चला आ रहा भगवान विश्वकर्मा का पूजन अर्चन किया गया इसके साथ ही पूजन का समाप्त के बाद प्रसाद वितरण किया।

हिंदू धर्म में विश्वकर्मा जयंती का काफी बड़ा महत्व है। हिंदू धर्म में, भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का शिल्पकार माना जाता है। हिंदू धर्म में सृष्टि के सभी यांत्रिक और स्थापत्य कार्यों का जनक भगवान विश्वकर्मा को ही माना जाता है। हिंदू धर्म में भगवान विश्वकर्मा के जन्म को लेकर कई मान्यताएं और कहानियां प्रचलित हैं। कुछ पौराणिक कथाओं के अनुसार ऐसा माना जाता है कि आश्विन माह के कृष्ण पक्ष के दिन ही भगवान विश्वकर्मा का जन्म हुआ था वहीं कुछ लोगों का ऐसा भी मानना है कि भगवान विश्वकर्मा का जन्म भाद्रपद माह की अंतिम तिथि को हुआ था। लेकिन भगवान विश्वकर्मा की जन्म तिथि के अलावा एक और भी मान्यता प्रचलित है, जिसमें विश्वकर्मा पूजा को सूर्य के परागमन के अनुसार तय किया गया। अधिकांश हिंदू त्योहार चंद्र कैलेंडर के आधार पर हर साल अलग-अलग तिथियों पर पड़ते हैं। लेकिन विश्वकर्मा पूजा की तारीख सूर्य की गति पर आधारित होने के कारण लगभग हर साल एक ही रहती है, जो कि 17 सितंबर है विश्वकर्मा जयंती को कुछ जगह पर सूर्य संक्रांति के रूप में भी मनाया जाता है। यह दिन हर साल 17 सितंबर को ही पड़ता है। यही कारण है कि विश्वकर्मा जयंती हर साल 17 सितंबर को ही मनाई जाती है। वहीं ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं की मानें तो, जिस दिन सूर्य कन्या राशि में गोचर करते हैं, उसी दिन भगवान विश्वकर्मा का जन्म हुआ था। इसलिए, इस शुभ दिन को उनकी जयंती और के रूप में भी मनाया जाता है।

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